MAATRA-1 -
***************
प्रश्न:- तुम किसकी आज्ञासे , किसके समझ ने पर इस संसार में आये…?.
उत्तर :- सद्गुरु अविनाशी मुनि द्वारा दीक्षित होकर पूर्व जनम के लेख के अनुसार लोक कल्याण केलिए में आया हूँ ….!.अब तुम लोक सावधान होकर अलख पुरुष का स्मरण करो और अपने अपने गाँव-नगरी आत्मोधर के ज़रिये समाज के उद्धार कर डालो…!.ज्ञान ही गुदडि हैं, क्षमा ही टोपी हैं, संयम ही कमर बंद हैं….!. शील ही कौपीन हैं…!. (शीएल का कौपीन का अर्थ खुला-दिल यानि जो गोपनीय हैं उसे छोड़ कर बांकी सारे खुले छोडना)…!.कर्म बंधन से खुद को मुक्त समझना ही कन्या हैं , इच्छा रहित रहना झोली हैं, युक्ति ही टोपी हैं, गुरु उपदेश ही बोली हैं, द्धर्म ही चोला हैं, सत्य ही सेली(उपवीत) हैं….!, मर्यादा पालन ही कफनी हैं,ध्यान ही बटुआ हैं(कमाई हैं), निरत ही सीना हैं, ब्रह्म ही अंचल हैन्जिसे चतुर लोक पहनते हैं…!.निर्लेप-वृत्ति ही मोरछल हैं, द्वेष हीन निर्भयता ही जंगडोरा , जाप ही जांघिया हैं, गुण ही उड्यिनी - उड्नेकी विद्या हैं….!. , ओंकार वाणी ही सिंगी का शब्द हैं….!,लज्जा ही कान का मुद्रा ‘कुंडल’ हैं, शिव ही विभूति हैं, हरी भक्ति ही मृगछाला हैं, जिसे गुरु पुत्र पहनते हैं….!,संतोष ही सूत हैं, विवेक ही धागे हैं- जिन्हें वात्सल्य प्रीति की सूई लेकर सद्गुरु सीता हैं…!. इसे जो अपने पास रखता हैं, वह निर्भय होता हैं….!. इस श्याम, श्वेत, पीत,और रक्त वर्ण के कपडे पहने सारे तेरे गुरु भाई हैं….!. तीन गुण अर्थात - सत्व,राज, तम की चकमक से अग्नि-मंधन करके दुःख-सुख के कुंद में हमने अपनी देह जलाई हैं….!.शोभासे युक्त संयम रुपी महादेवजी के चरण कमलों में हमारी अत्यंत प्रीति लगी हुयी हैं…!. हमने भाव भोजन ही अमृत बनाकर प्राप्त किया हाँ, इसलिए हमारे मन में भले-बुरे की भावना ही नहीं रह गयी है…..!.पात्र-अपात्र का विचार ही हमारा बहुगुण संयुक्त फेरुहा, कमंडल,तुम्बी और किश्ती हैं…!. जो साधू उस परम अमृत के पेय को मन लगाकर कर पीता हैं, वाही शान्ति पाटा हैं…!.वह परम शक्ति इडा और पिंगला में दौड़ती रहती हैं और फिर सुषुम्ना में स्वाभाविक रूप से निवास करने लगती हैं…..!.
हमारा काम हैं की हुम सम्पूर्ण इच्छाएं छोड़कर उस निराशा मठ में निरंतर ध्यान लगाए रहें और उस निर्भय नगरी में गुरु ज्ञान का दीपक जलाएं जहाँ स्थिरता ही हारी रूधि हो, अमरत्व ही हमारा दंड हो, धैर्य ही हमारी कुदाली हो , ताप ही खड्ग हो, इन्द्रयों को वश में करना ही आसा अर्थात टेका हैं….!. समदृष्टि ही चौगान हो, जिससे की किसी प्रकार मन में इर्ष्य य शोक न आयें…..!. सहज वैरागी को इसी प्रकार माया की सम्पूर्ण मोहिनी त्याग कर वैराग्य साधना चाहिए ….!. एइसे करने वालों केलिए भगवान नाम ही पक्खर य कवल हैन्ल्लल्ल्ल!. पवन य प्राणायाम उसका वह घोडा हैं, जिसके लिए कर्मोंकी विरक्ति ही जीन हैं, तत्व ही उसका जोड़ा य वेश हैं, निर्गुण ही ढाल हैं, गुरु का शब्द ही धनुष हैं, बुद्धि ही कवच हैं, प्रीति ही बाण हैं, ज्ञान ही कर्शी हैं, गुण ही कटारी हैं….!. इस प्रकार संयम के शास्त्रों से सुसज्जित साधक अपने मन को मार कर जब सवारी करने लगता हैं, तब वह माया के विषम गढ़ को तोड़ कर निर्भयता पूर्वक अपने घर अर्थात ब्रह्म में लौट आता हैं…..!.
यहाँ पहुँचने पर अनेक प्रकार के वाद्यों और शंखों से उसका स्वागत किया जाता हैं…..!. स्वत: अखंड आनंत रूप ब्रह्म ही साधक का यज्ञोपवीत हैं, मानसिक निर्मलता ही उसकी धोती हैं, ‘सोअहम’ जप ही सच्ची माला हैं, गुरुमंत्र ही शिखा हैं, हरी नाम ही गायत्री हैं, जिसे वह स्थिर आसन पर बैठ कर शान्ति के साथ जपता हैं…!. पूर्ण ब्रह्म का ध्यान ही उसका ‘तिलक’ हैं, यश ही तर्पण हैं,प्रेम ही पूजा हैं….!. ब्रह्मानंद ही भोग हैं, निर्वार्यता ही ‘संध्या’ हैं, ब्रह्म का साक्षात्कार ही ‘छापा’ हैं…..!. इतना होने पर वह अपने मन के सम्पूर्ण संकल्प- विकल्प स्वयं नष्ट कर डालता हैं …!. इस ब्रह्म की प्रीति ही पीताम्बर हैं , मन ही ‘मृगशाला-ZOO” हैं…!.चित में उस चिदम्बर परमेश्वर का स्मरण ही रुंडझुण्ड माला है ….!. एइसे व्यक्ति को जो बुद्धि पहले रोयेंवाले बघंम्बर कुलाह य ऊंची टोपी , खौस अर्थात जूते और खड़ाओं में ही लीं रहती थी , वह सब प्रकार के चूड़े और शृंखला अआदी बंधन तोड़ कर उदासीन साधू का बाण ग्रहण कर लेता हैं और केवल जाता -जूट का मुकुट बाँध कर एइसा मुक्त हो जाता हैं कि फिर उसे कोई बंधन नहीं होता……!.
नानक के पुत्र श्री चन्द्र ने येही मार्ग बताया हैं, जिसका रहस्य जान लेने पर ही तत्व मिल सकता हैं…..!. इस मात्रा को जो धारण कर लेता हैं, वह आवागमन के सब बंधनों से मुक्त हो जाता हैं……!.