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Posted 3 months ago

एक शिष्य ने गुरु से पुछा :- ईश्वर कहाँ हैं?
गुरु ने कहा :- ईश्वर सब में हैं।
तभी एक हाथी बेकाबू होकर भागता नज़र आया I पीछे-पीछे महावत चिल्ला रहा था ’ रस्ते से हट जाओ , हाथी पागल हैं।’

गुरु एक तरफ हो गए .पर शिष्य गुरु की बात याद कर रास्ते पर ही खडा रहा और सोचने लगा कि , जब सब में ईश्वर हैं , तो इस हाथी में भी होगा I. हाथी चिंघाड़ता हुआ शिष्य के पास आया और उसे सूंड में उढ़ाकर दूर झाड़ियों में फेंक दिया I शिष्य को बहुत चोट आई I

गुरु उसे देखने गए तो उसने पुछा :- आपने तो कहा था कि ईश्वर सब में है फिर ऐसा क्यों हो गया ..? हाथी में भी अगर ईश्वर था तो उसने मुझ निर्दोष पर हमला क्यों किया?.

गुरु ने कहा :- ’ ईश्वर तो उस महावत में भी था, जो हाथी के पीछे - पीछे चिल्लाता आ रहा था हाथी पागल हैं . तुमने उसकी बात क्यों नहीं सुनी?’

Posted 4 months ago
अनहोनी होती नहीं , होनहार सो होय ।
कथनी करनी एक करो निष्ठा न छोडो कोय ।।
Posted 4 months ago

सर्व धर्मबहिर्भूतः सर्वपापरतस्तथा ।
मुच्यते नात्र संदेहो विष्णोरनामानुकीर्तनात ।।

अर्थ :- सर्व धर्म त्यागी और सर्वपापनिरत पुरुष भी यदि हरिनाम कीर्तन करता हैं तो वह सकल पापों से छूट जाता हैं।

वैशम्पायन संहिता
Posted 4 months ago
नाम कीर्तनं यस्य सर्वपाप प्रना-प्रणाशनम ।
प्रणामो दुःखशमानास्तम नमामि हरिम परम ।।
श्रीमद भागवत
Posted 4 months ago

भगवन्नाम की श्रेष्ठता….!

कीर्तन सकल कर्म , कीर्तन सकल धर्म,कीर्तन सकल ब्रह्मज्ञान ।
कीर्तन अगम वेद , राजसूय, अश्वमेध,कीर्तन शरण,गंगास्नान ।
कीर्तन सकल तीर्थ,कीर्तन आवेश नृत्य,शिव,शुक,नारद,गोचर ।
कीर्तन वैकुण्ठ पद ,कीर्तन समुद्र,नाद,कीर्तन साभार परापर ।
कीर्तन श्रवण मात्रे ,अधर्म न रहे गात्रे , कीर्तन दर्शन पापक्षय ।
कीर्तन रसेर भक्ति ,कीर्तन नर्तक मूर्ती, कीर्तन मार्जने सर्व जय ।
कीर्तन गायन सर्व ,से सब हय गन्धर्व, नृत्यक इंद्र पद पान ।
कीर्तन भारत पुराण ,ताप जप दान ,ध्यान ,केह नहे कीर्तन सामान ।
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सब लोग कीर्तन पारायण क्यों नहीं होते?
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इसका उत्तर यह हैं कि नाम परायण होना जितना मुख से सहज कहा जाता हैं,वास्तव में उतना सहज नहीं हैं ।. बड़े पुण्य़बल से नाम में रूचि होती हैं ।शास्त्र पढना, उपदेश देना,बड़े बड़े शास्त्रार्ध करना सहज हैं,परन्तु निश्चित मन से विशवास पूर्वक भगवान का नाम लेना कठिन हैं।कुछ लोग इसकी ओर ध्यान ही नहीं देते , जो कोई ध्यान देते हैं उन्हें इसके सहजपन (सुकरत्व) देख कर अश्रद्धा हो जाती हैं।वे समझते हैं कि जब बड़े-बड़े यज्ञ, तप, दानादि सत्कर्मों से ही पापवासना का नाश होकर मन की वृत्तियाँ शुद्ध और सात्विक नहीं बनती, तब केवल नामोच्चारण या शब्दोच्चारण मात्र से क्या हो सकता हैं? वे लोग इसे मामूली शब्द समझ कर छोड़ देते हैं। कुछ लोग पण्डिताई के अभिमान से , शास्त्रों के बाह्यावलोकन से केवल वाग - पितण्डार्थ शास्त्रार्थ पटु हो कर नाम का आदर नहीं करते । पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त (मार, माउन्ट,सेक्रेट ,सेंट ,होली एंजेल, एडवेंटिस्ट, शिक्षा ) पुरुष प्रायः आधुनी पाश्चात्य - सभ्यता की ‘माया मरीचिका में पड़ कर ऐसी बातो को केवल व्यर्थ कर्म ही समझते हैं ।
नाम कीर्तन करने की विधि :-
(1) सबसे पहले यह दृढ़ निश्चय करले कि इतने समय तक हमें नाम कीर्तन करना हैं।
(2) इतना समय केलिए मेरा संसार से कोई सम्बन्ध नहीं, मेरा सम्बन्ध केवल भगवान से हैं।
(3) निर्दिष्ट समय तक बाह्य व्यवधानों से बचना - मोबाइल ,छोटे बालक-बालिकाएँ ,प्रियजन ।
(4) बड़ी से बड़ी विपत्ति ,यहाँ तक मृत्यु आ जाय तो भी नियम चोदना नहीं ।