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“BHAGWAN SRI CHANDER MAHARAJ DI AARTI- MATRA SAHIB….!”

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Mahant Anantanand cremated/ Udasin Ashram Akhada/ Amritsar/उदासीन आश्रम के महंत अनंतानंद पंचतत्व में विलीन

“उदासीन आश्रम के महंत अनंतानंद पंचतत्व में विलीन…..!”

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MAATRA-1 -
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प्रश्न:- तुम किसकी आज्ञासे , किसके समझ ने पर इस संसार में आये…?.
उत्तर :- सद्गुरु अविनाशी मुनि द्वारा दीक्षित होकर पूर्व जनम के लेख के अनुसार लोक कल्याण केलिए में आया हूँ ….!.अब तुम लोक सावधान होकर अलख पुरुष का स्मरण करो और अपने अपने गाँव-नगरी आत्मोधर के ज़रिये समाज के उद्धार कर डालो…!.ज्ञान ही गुदडि हैं, क्षमा ही टोपी हैं, संयम ही कमर बंद हैं….!. शील ही कौपीन हैं…!. (शीएल का कौपीन का अर्थ खुला-दिल यानि जो गोपनीय हैं उसे छोड़ कर बांकी सारे खुले छोडना)…!.कर्म बंधन से खुद को मुक्त समझना ही कन्या हैं , इच्छा रहित रहना झोली हैं, युक्ति ही टोपी हैं, गुरु उपदेश ही बोली हैं, द्धर्म ही चोला हैं, सत्य ही सेली(उपवीत) हैं….!, मर्यादा पालन ही कफनी हैं,ध्यान ही बटुआ हैं(कमाई हैं), निरत ही सीना हैं, ब्रह्म ही अंचल हैन्जिसे चतुर लोक पहनते हैं…!.निर्लेप-वृत्ति ही मोरछल हैं, द्वेष हीन निर्भयता ही जंगडोरा , जाप ही जांघिया हैं, गुण ही उड्यिनी - उड्नेकी विद्या हैं….!. , ओंकार वाणी ही सिंगी का शब्द हैं….!,लज्जा ही कान का मुद्रा ‘कुंडल’ हैं, शिव ही विभूति हैं, हरी भक्ति ही मृगछाला हैं, जिसे गुरु पुत्र पहनते हैं….!,संतोष ही सूत हैं, विवेक ही धागे हैं- जिन्हें वात्सल्य प्रीति की सूई लेकर सद्गुरु सीता हैं…!. इसे जो अपने पास रखता हैं, वह निर्भय होता हैं….!. इस श्याम, श्वेत, पीत,और रक्त वर्ण के कपडे पहने सारे तेरे गुरु भाई हैं….!. तीन गुण अर्थात - सत्व,राज, तम की चकमक से अग्नि-मंधन करके दुःख-सुख के कुंद में हमने अपनी देह जलाई हैं….!.शोभासे युक्त संयम रुपी महादेवजी के चरण कमलों में हमारी अत्यंत प्रीति लगी हुयी हैं…!. हमने भाव भोजन ही अमृत बनाकर प्राप्त किया हाँ, इसलिए हमारे मन में भले-बुरे की भावना ही नहीं रह गयी है…..!.पात्र-अपात्र का विचार ही हमारा बहुगुण संयुक्त फेरुहा, कमंडल,तुम्बी और किश्ती हैं…!. जो साधू उस परम अमृत के पेय को मन लगाकर कर पीता हैं, वाही शान्ति पाटा हैं…!.वह परम शक्ति इडा और पिंगला में दौड़ती रहती हैं और फिर सुषुम्ना में स्वाभाविक रूप से निवास करने लगती हैं…..!.
हमारा काम हैं की हुम सम्पूर्ण इच्छाएं छोड़कर उस निराशा मठ में निरंतर ध्यान लगाए रहें और उस निर्भय नगरी में गुरु ज्ञान का दीपक जलाएं जहाँ स्थिरता ही हारी रूधि हो, अमरत्व ही हमारा दंड हो, धैर्य ही हमारी कुदाली हो , ताप ही खड्ग हो, इन्द्रयों को वश में करना ही आसा अर्थात टेका हैं….!. समदृष्टि ही चौगान हो, जिससे की किसी प्रकार मन में इर्ष्य य शोक न आयें…..!. सहज वैरागी को इसी प्रकार माया की सम्पूर्ण मोहिनी त्याग कर वैराग्य साधना चाहिए ….!. एइसे करने वालों केलिए भगवान नाम ही पक्खर य कवल हैन्ल्लल्ल्ल!. पवन य प्राणायाम उसका वह घोडा हैं, जिसके लिए कर्मोंकी विरक्ति ही जीन हैं, तत्व ही उसका जोड़ा य वेश हैं, निर्गुण ही ढाल हैं, गुरु का शब्द ही धनुष हैं, बुद्धि ही कवच हैं, प्रीति ही बाण हैं, ज्ञान ही कर्शी हैं, गुण ही कटारी हैं….!. इस प्रकार संयम के शास्त्रों से सुसज्जित साधक अपने मन को मार कर जब सवारी करने लगता हैं, तब वह माया के विषम गढ़ को तोड़ कर निर्भयता पूर्वक अपने घर अर्थात ब्रह्म में लौट आता हैं…..!.
यहाँ पहुँचने पर अनेक प्रकार के वाद्यों और शंखों से उसका स्वागत किया जाता हैं…..!. स्वत: अखंड आनंत रूप ब्रह्म ही साधक का यज्ञोपवीत हैं, मानसिक निर्मलता ही उसकी धोती हैं, ‘सोअहम’ जप ही सच्ची माला हैं, गुरुमंत्र ही शिखा हैं, हरी नाम ही गायत्री हैं, जिसे वह स्थिर आसन पर बैठ कर शान्ति के साथ जपता हैं…!. पूर्ण ब्रह्म का ध्यान ही उसका ‘तिलक’ हैं, यश ही तर्पण हैं,प्रेम ही पूजा हैं….!. ब्रह्मानंद ही भोग हैं, निर्वार्यता ही ‘संध्या’ हैं, ब्रह्म का साक्षात्कार ही ‘छापा’ हैं…..!. इतना होने पर वह अपने मन के सम्पूर्ण संकल्प- विकल्प स्वयं नष्ट कर डालता हैं …!. इस ब्रह्म की प्रीति ही पीताम्बर हैं , मन ही ‘मृगशाला-ZOO” हैं…!.चित में उस चिदम्बर परमेश्वर का स्मरण ही रुंडझुण्ड माला है ….!. एइसे व्यक्ति को जो बुद्धि पहले रोयेंवाले बघंम्बर कुलाह य ऊंची टोपी , खौस अर्थात जूते और खड़ाओं में ही लीं रहती थी , वह सब प्रकार के चूड़े और शृंखला अआदी बंधन तोड़ कर उदासीन साधू का बाण ग्रहण कर लेता हैं और केवल जाता -जूट का मुकुट बाँध कर एइसा मुक्त हो जाता हैं कि फिर उसे कोई बंधन नहीं होता……!.
नानक के पुत्र श्री चन्द्र ने येही मार्ग बताया हैं, जिसका रहस्य जान लेने पर ही तत्व मिल सकता हैं…..!. इस मात्रा को जो धारण कर लेता हैं, वह आवागमन के सब बंधनों से मुक्त हो जाता हैं……!.
“RAMDAS”

(Source: gobindsadanusa.org)

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BABA SRICHAND JI”

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‘MATRA -1”

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उदासीन संप्रदाय के आचार्य जगतगुरु श्रीचन्द्र जी का जन्म bhadr pad , शुक्ल नवमी संवंत (१५५१- A.D. १४९४) को लाहोर की खड़गपुर तहसील के तलवंडी गाँव में श्री गुरु नानक देव महाराज की पत्नी सुलाक्ष्ना देवी के यहाँ हुआ….!.बचपन से ही वैराग्य बुद्धि रहता था …!. ११वे वर्ष में पंडित हरदयाल शर्मा आपको यग्योपवीत संस्कार कराया तथा पंडित पुरुषोतम कौल से वेड , वेदांग , और शास्त्रों का गंबीर अध्ययन किया….!. अपूर्व और असाधारण प्रतिभा के धनि होने के कारण बहुत कम समय में उन्हें साड़ी विद्याएँ स्वायत होगई…….!. कश्मीर में ही उन्होंने उदासीन मत की दीक्षा ली और क्षय होते सनातन धर्म के पुनारुधारण अपनी जीवन की लक्ष्य माना ….!. भगवान श्री चन्द्र , ईएश्वर् को निर्गुण, निराकार , अकाल मानते हुए भी पञ्चदेवोपासना और वैदिक कर्म कांड के पूर्ण समर्थक थे …..!
.पञ्च देव:-( १). श्रीगणेश (२). श्री शिव. (३). श्री विष्णु (४). सूर्य (५).श्री दुर्गा.
श्री चंद्रजी महाराज ने ब्रह्मसूत्र , गीता तथा वेदों पर भक्ति ज्ञान लिखा…!.इनका मात्र शास्त्र वुदसीन सम्प्रदाय का वेड मन्त्र हैं….!. जो गृहस्थ हिन्दू के आचार - विचार तथा संत के जीवन दर्शन - महान लक्ष्य पर प्रकाश डालती हैं..!. आचार्य श्री के उपदेश लिपिबद्ध करने पर १३ मात्राएँ प्रकाश में आई - जो मन्त्र के सामान पवित्र और जिनके पाठ से इह - परलोक की सिद्धि प्राप्त होती हैं……!.
‘माँ’ - माया तस्यात्रायते यानि माया से रक्षा करनेवाली ब्रह्म विद्या ….!. नागरी भाषा में लिखे गए इनकी १३ मात्राओं में प्रथम मात्रा ही सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं…..!. अलबता सूत्र शैली में लिखा एक नन्हा सा काव्य हैं यह….!.
धर्म प्रचार हेतु भगवान श्री चन्द्र तिबत, भूटान , नेपाल, वृन्दावन, मधुरा, अयोध्या, प्रयाग, काशी, नवद्वीप, बंगाल, असाम, जगन्नाथ पूरी, जनकपुर , कंथार, काबुल, ठट्ठा , थकली, कश्मीर, चंबा, तथा उतरी-पश्चिमि सीमा प्रांत के सुदूर नगरों की यात्राएं की…..!.ठट्ठा, कश्मीर, कंथार काबुल, तथा पेशावर जैसे सीमान्त क्षेत्रों में जाकर हिन्दू- उस्लिम एकता का जो उपदेश उन्होंने दिया, वह कार्य उनसे पूओर्व इतने व्यापक स्टार पर किसी हिन्दू आचार्य द्वारा मध्य युग में नहीं हो सका था ….!. इनके आध्यात्मिक एवं राष्ट्रीय विचारों से प्रभावित होकर , शिवाजी, महा राणाप्रताप,गुरु अंगद जी, गुरु रामदासजी, गुरु अर्जुन देवजी, ने भी इनको सदैव सम्मान किया….!.उदासीन सम्प्रदाय का गठन स्मार्त हिन्दू धर्म की रक्षा और प्रचार केलिए हुआ…..!.
इस प्रकार १४९-वाँ आयु पर १७00 की पौष कृष्ण पंचमी को ब्रह्मकेतु जी को अंतिम उपदेश देकर श्री चन्द्र देवजी रावी नदी पार गए और चंपा के जंगलों में अंतर्ध्यान हो गए…..!. अजर-अमर श्री चन्द्र गुरुदेर्व की यह अंतर्ध्यान दिन ही उनकी निर्वाण तिथि हैं…..!.